नीलकंठ पक्षी की कहानी

नीलकंठ पक्षी की कहानी

नीलकंठ पक्षी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहानी है, जो भगवान शिव से संबंधित है। कहते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान, जब देवताओं और दानवों ने समुद्र को मथा, तो उसमें से हलाहल विष निकला। इस विष से पूरा संसार नष्ट होने लगा, तब भगवान शिव ने उस विष को पी लिया। शिव ने विष को गले में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला हो गया और उन्हें 'नीलकंठ' कहा जाने लगा।


इसी तरह, नीलकंठ पक्षी का भी गला नीला होता है, और इसे शुभ माना जाता है। भारत में नीलकंठ पक्षी को देखने पर लोग इसे भगवान शिव का आशीर्वाद मानते हैं। खासकर दशहरे के दिन, नीलकंठ को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस पक्षी को भारत में खास सम्मान और प्रेम दिया जाता है, क्योंकि यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।


नीलकंठ (Indian Roller) एक सुंदर और रंग-बिरंगा पक्षी है, जिसे हिंदी में "नीलकंठ" कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Coracias benghalensis है। नीलकंठ के पंख नीले और भूरे रंग के होते हैं, और जब यह उड़ता है, तो उसके पंखों का चमकीला नीला रंग बहुत ही आकर्षक लगता है।


नीलकंठ का रहन-सहन:

नीलकंठ भारत के विभिन्न हिस्सों में पाया जाता है, खासकर ग्रामीण और जंगलों वाले इलाकों में। यह अक्सर खेतों, बागों और खुले क्षेत्रों में दिखाई देता है, जहां यह पेड़ों या तारों पर बैठा रहता है। यह पक्षी कीड़े, टिड्डे, और छोटे जन्तुओं का शिकार करता है और उन्हें अपने भोजन के रूप में खाता है।

धार्मिक महत्व:

नीलकंठ को भारतीय संस्कृति में बहुत शुभ माना जाता है। खासकर दशहरे के दिन नीलकंठ को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है, क्योंकि यह भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। नीलकंठ का नाम भगवान शिव के उस रूप से जुड़ा है, जब उन्होंने समुद्र मंथन से निकले विष को पिया था और उनका गला नीला हो गया था। 

नीलकंठ का संरक्षण:

हालांकि नीलकंठ भारत में एक सामान्य पक्षी है, फिर भी हमें इसके संरक्षण का ध्यान रखना चाहिए। कृषि में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों और निवास स्थान के नुकसान के कारण इसके आवास खतरे में पड़ सकते हैं।

नीलकंठ अपने आकर्षक रंगों और धार्मिक महत्व के कारण न केवल भारत में, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण पक्षी है। इसे देखकर लोगों के मन में श्रद्धा और प्रसन्नता का भाव उत्पन्न होता है।

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